शोर से विलीन

इस सुगबुगाहट में
मेरा मन क्यूँ सन्नाटे सा विलीन है?

क्यू इसे सिर्फ शोर ही दिख पड़ता है?

क्यू ये सिर्फ धड़कनो को गिन रहा है?

ये मोर की ताल पर ठुमक क्यों रहा है?

क्यों इसे रोशनी की आहट नहीं आती?

क्यों इसे हवा की ठंडक नहीं दिखती?

क्यू ये पपीहा के गान की माला नहीं पिरोता?

क्यू ये भुट्टे की अंगार को नहीं सरोता?

क्यू कल कल करती बूंदो की खामोशी नहीं समझता?

क्यों ये फिर मस्त मौला नहीं होता?

क्यू ये अपनी ही बुदबुदाहट में गुमसुम है?

क्यू ये सुगबुगाहट से नहीं निकलता?

मैं चातक सा अविरल हूँ करता हूँ प्रतीक्षा की
कभी इस सुगबुगाहट में
मेरी धौकनी नरम सांस बन जाएगी
इस शोर के बीच धीरे-धीरे खामोशी भी गायेगी

ये टूटा मन
एक दिन अपनी ताल बनायेगा,
मोर की ताल के साथ मिलकर फिर दिल को थिरकायेगा

रोशनी की आहट पंख से हल्की जब लगने लगेगी।
हवा की ठंडक
इठला-इठला उंगलियों को छू जाएगी,
तब पपीहा के गान की माला आप ही पीरो जाएगी।

भुट्टे की अंगार से
फिर से मन महक जाएगा,
कल-कल करती बूंदों का शब्द
एक कविता सा राग सुनायेगा।

और तब मेरा मन
फिर मस्त-मौला होगा -
अपनी बुदबुदाहट से निकल कर
खुद की एक नई धुन गाता होगा

प्रयुत मंडल


Comments

Popular posts from this blog

A Leaf's Tree

The Last Street Lamp in the City